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माँ डिडनेश्वरी देवी | संभावनाओ का प्रदेश - छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ के सिद्ध शक्तिपीठों की इस श्रृंखला में, अगला नाम धार्मिक आस्था का केंद्र, मां डिडनेश्वरी का आता है, जो बिलासपुर के निकट मल्हार में स्थित हैं। जहां पुरातत्व संपदा यत्र तत्र बिखरी हुई है । कहते है इस क्षेत्र के पत्थर - पत्थर में देवी देवता विराजमान हैं। टूटी-फूटी मूर्तियां, पत्थर और तांबे पर कुरेदे अजीब अक्षर, पकी मिट्‌टी के खिलौने-ठीकरे और सोने, चांदी, तांबे के सिक्के, ढेरों तरह के अवशेष और न जाने कितने पुराने देवालयों के खंडहर भी प्राप्त होते रहते हैं ।

प्राकृतिक एवम् पुरातात्विक महत्व के इस क्षेत्र में मां विराजमान है।

पद्मासन में विराजित, यह शुद्ध काले ग्रेनाइट से बनी, 10वी - 11वी शताब्दी की कल्चुरी कालीन, तपस्या करती मां डिडनेश्वरी की प्रतिमा किसी राजकन्या का अहसास कराती है। 

सोलह श्रृंगार युक्त, प्रभामंडल सहित यह दिव्य अलौकिक प्रतिमा, सुबह बालिका, दोपहर में युवती एवं रात्रि में महिला के रूप का आभास देती है। इस प्रतिमा से विशेष ध्वनि निकलती है। 

स्थानीय लोगों के अलावा, छत्तीसगढ़ एवं संपूर्ण देश से भी जनमानस इस प्रतिमा के दर्शन करने मल्हार पहुंचते हैं। कोई भी भक्त मां की चौखट से खाली हाथ नहीं जाता।

10वी-11वी ईस्वी के इस मन्दिर को शक्ति पीठ कहा जाता है। शिव को प्राप्त करने हेतु तपस्या रत पार्वती का अहसास कराती यह प्रतिमा, मूर्ति कला का उत्कृष्ट नमूना है।

बिलासपुर से 40 किलो मीटर दूर, जोधरा मार्ग पर छत्तीसगढ़ के प्राचीनतम शहर मल्हार कौशांबी पर मां डिडनेश्वरी देवी विराजमान हैं। उत्खनन से प्राप्त अवशेषों से ज्ञात हुआ, कि ईसा से लगभग हजार वर्ष पूर्व से लेकर, मराठा काल तक इस मंदिर की उपस्थिति रहीं है। ईसा पूर्व 1000 में मौर्य काल, द्वितीय सातवाहन , कुषाण काल, तृतिय शरभपुरीय,तथा सोमवंशी काल चौथा और पांचवा कल्चुरी काल । कल्चुरी के बाद मराठा एवम् अंग्रेजों का शासन क्रमशः रहा है। मल्हार डिडनेश्वरी प्रतिमा के साथ ही अपनी सुक्ष्म एवम् भव्य शिल्प कला के लिए प्रसिद्ध है। इसके साथ ही शैव, शाक्त, जैन और बौद्ध शिल्प कला एवम् भगवान विष्णु की प्राचीन चतुर्भुजी प्रतिमा भी अत्यंत प्रसिद्ध है। मौर्य कालीन ब्राह्मी लिपि मे लेखानुसार, इस विष्णु मूर्ति की स्थापना ईसा पूर्व 200 है । साथ ही कार्तिकेय एवम् गणेशजी की प्रतिमा भी प्राप्त हुई है। जो 5वी एवम् 7वी शताब्दी की है। इसके अलावा भी इस क्षेत्र में पुरातात्विक महत्व की कई सामग्री एवं मूर्तियां बिखरी पड़ी हैं।

अंजली बद्ध पद्मासन में ध्यान में लीन, शांत, काले ग्रेनाइट की प्रतिमा, जिसके दोनों भुजाओं एवम् नीचे तीन -तीन देवियों के चित्रण के कारण इसे दुर्गाजी का, तो कई यशोधरा कहते हैं, जो कि गौतम बुद्ध की पत्नी हैं। दुर्गा या महामाया का रूप ही अधिकांशतः इस मूर्ति को कहां जाता है। जिसे कल्चुरी काल की कुलदेवी (डिडनेश्वरी,) कहा जाता है। 

डिडनेश्वरी देवी के परम भक्त राजा वेणु द्वारा मल्हार नगर को बसाया गया है, जब उन अत्यंत धार्मिक राजा वेणु की ख्याति देवलोक पहुंची, तब स्वर्ण वर्षा हुई। आज भी ज़मीन से स्वर्ण की प्राप्ति खुदाई में होती है । जिससे इस घटना की सत्यता साबित होती है । बेशकीमती और ठोस पत्थरों की गुरिया और मनकों की तो खान ही है। निषाद समाज द्वारा इस मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया गया, जो काल के गर्त में समा गया था। निषाद समाज में लड़के को डिंडवा और लड़की को डिंडवी कहते हैं। संभवतः इसी कारण यह नाम रखा गया, या शंकरजी के डमरू की डिंडिम ध्वनि भी इसका कारण हो सकती है ।

     इस विशाल मंदिर का पता खुदाई के दौरान चला, जो भूमि में समय हुआ था । मूर्ति की पुनर्स्थापना की गई । 18अप्रैल 1981 को चोरों ने मूर्ति को चोर कर, मैनपुरी के खेतों में गाड़ दिया। जो प्रशासन द्वारा बरामद कर वापिस लाई गई। अंग्रेजों के शासन काल में भी मूर्ति को चुराने की नाकाम कोशिष की गई। चुराने वालों को शारीरिक पीड़ा होने लगी और वो मूर्ति को छोड़कर भाग गए ।

माँ डिडनेश्वरी देवी

2000 ईस्वी से अब तक मंदिर का पुनर्निर्माण जारी है । पूर्व में यहां मल्लापत्तन नमक विशाल और वैभवशाली नगर था, जो शायद डिडनेश्वरी मां के एक और नाम मल्लिका का प्रतीक है । कई साधकों ने इसके सिद्धपीठ होने की पुष्टि की है ।उनके अनुसार यहां रात्रि में पायल को मंद ध्वनि गुंजित होती है । जिसकी पुष्टि स्थानीय पूजारी सहित राघौगढ़ के साधक, कामाख्या के साधक करते है । मुंगेर के युवा तांत्रिक ने भी इसका प्रत्यक्ष अनुभव किया है । कहते हैं जो भी युवती अपने इच्छानुसार व की प्राप्ति के लिए मन्नत का धागा बांधती है, उसकी इच्छा अवश्य ही पूर्ण होती है । चैत्र नवरात्रि में गांव में भक्ति का माहौल रहता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर में भी विशेष पूजा-अर्चना व धार्मिक आयोजन होते हैं। डिडनेश्वरी के रंग में रंग जाते है। मल्हार की विशेषता एवम् पुरातात्विक महत्व के बारे में, जितना भी वर्णन किया जाए कम है । घर - घर में प्राचीन संपदा बिखरी हुई है ।जिसे अधिक जागरूकता के साथ व्यवस्थित करने की आवश्यकता है ।

पहुंच मार्ग---
एयरपोर्ट -रायपुर - दूरी 148 किलो मीटर।
रेलमार्ग - निकटस्थ स्टेशन बिलासपुर - 32किलो मीटर
सड़क मार्ग - बिलासपुर से मस्तूरी होकर मल्हार की यात्रा निजी वाहन अथवा बस द्वारा की जा सकती है।

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