Bhartiya Parmapara

भारतीय योग पद्धति अपनाएं, जीवन को खुशहाल बनाएं

आज की भागदौड़ भरी और व्यस्त जीवनशैली के कारण अधिकांश लोग मानसिक तनाव से पीड़ित होने लगे हैं। यंत्र पर आधारित मनुष्य जीवन ने मनुष्य को भी यांत्रिक बना दिया है। पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण, भौतिक वस्तुओं के प्रति अति मोह, जीवन में संवेदना और संबंधों से अधिक रुपयों का महत्व, इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का अत्यधिक उपयोग, शहर में जाकर बसने की लोगों में बढ़ रही लालसा, लक्ष्य-प्राप्ति के मार्ग में आने वाले अवरोध, अपने कार्य क्षेत्र में बार-बार मिलती असफलताएं, स्पर्धात्मक जीवन-शैली, अनगिनत अपेक्षाएं आदि मानसिक तनाव के मुख्य कारण हैं। आज के समय में मानसिक तनाव व्यक्ति के जीवन का एक हिस्सा बन गया है। शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति मिलेगा जो मानसिक तनाव से पीड़ित न हुआ हो।

मानसिक तनाव अर्थात हताशा और संघर्ष की एक ऐसी परिस्थिति जो व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक शक्ति के ऊपर विपरीत असर करती है। मानसिक तनाव अर्थात चिंता, हताशा, मायूसी, घबराहट, बेचैनी और उन्माद की एक ऐसी स्थिति जो व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक संतुलन पर घातक असर करती है। व्यक्ति जब निरंतर मानसिक तनाव का अनुभव करता है और उससे लड़ने की उसमें शक्ति का अभाव होता है तब वह आत्महत्या के मार्ग को भी अपना लेता है।

"मानसिक तनाव के उद्गम स्थान"
वर्तमान युग परिवर्तन का युग है। तीव्र गति से होने वाले परिवर्तन के युग में ख़ुद को बदल कर परिवर्तन के साथ सामन्जस्य स्थापित करना कोई सरल काम नहीं है। पारिवारिक, व्यावसायिक, सामाजिक, राजकीय और भौगोलिक परिवर्तन व्यक्ति में मानसिक तनाव पैदा करते हैं।
व्यक्ति अपने जीवन में आने वाले छोटे-छोटे परिवर्तनों को स्वीकार कर लेता है, लेकिन अचानक पैदा होने वाली किसी आघातजनक परिस्थिति या घटना को स्वीकार करना उसके लिए बहुत मुश्किल होता है। जैसे कि भूचाल की घटना के बाद व्यक्ति बार-बार उसकी भयानकता महसूस करे, भूचाल के विचार मात्र से डरने लगे, रात के समय नींद ना आये, डरावने सपने आएं, ये सारी नकारात्मक मानसिक परिस्थितियां मानसिक तनाव के कारण ही पैदा होती हैं। कभी-कभी जीवन में घटित होने वाली घटनाएं भी व्यक्ति में मानसिक तनाव पैदा करती हैं। जैसे कि परिवार में किसी सदस्य की अचानक मृत्यु होना, शादी के बाद तुरंत वैवाहिक जीवन में तनाव पैदा होना, पति-पत्नी का अलग हो जाना, तलाक लेना, कार्यस्थल पर अधिकारी द्वारा कर्मचारी को परेशान करना, जीवन में पैसों की तंगी महसूस करना, धंधे में बार-बार नुकसान आना, इच्छित लक्ष्य की प्राप्ति न होना और व्यक्ति के साथ अपनों के द्वारा विश्वासघात होना इत्यादि परिस्थितियों के कारण भी व्यक्ति मानसिक तनाव का शिकार बनता है। रोज ब रोज के जीवन में आने वाली मुश्किलें भी कभी-कभी मानसिक तनाव पैदा करती हैं। नौकरी करने वाली महिला को घर का सारा काम करने की बाध्यता, बच्चों की देखभाल, उनका शिक्षण, ऑफिस का काम, समय पर आना-जाना, नौकरी के स्थल पर आने-जाने में तकलीफें होना, परीक्षा देने जा रहे विद्यार्थी का बीच में ट्रैफिक में फंस जाना, परीक्षा का डर लगना इत्यादि परिस्थितियां मानसिक तनाव पैदा करती है।

 



 

 

भारतीय योग पद्धति

"मानसिक तनाव से मुक्ति के उपाय"
(१) सात्विक आहार : कभी-कभी मानसिक तनाव शरीर में रासायनिक असंतुलन के कारण पैदा होता है। आजकल के फैशन के युग में लोग अपने आहार की परंपरागत थाली को भूल गए हैं। होटलों में फास्ट फूड खाने का फैशन चल पड़ा है। फास्ट फूड में कई तरह के केमिकल्स और प्रिजर्वेटिव होते हैं जो शरीर में धीरे-धीरे जहर फैलाने का काम करते हैं। ऐसा आहार लेने से भी शरीर में रासायनिक परिवर्तन होता है और मानसिक तनाव पैदा होता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि फास्ट फूड को छोड़कर अपने स्वदेशी परंपरागत और सात्विक आहार को अपनाएं। ऐसा सात्त्विक आहार लेना चाहिए जिससे शरीर के लिए जरूरी सभी प्रकार के मिनरल्स, प्रोटींस, विटामिंस और केमिकल्स पूरी मात्रा में मिलें। ऋतुओं के अनुसार ताजा और हल्का आहार लेना चाहिए।

(२) व्यायाम : 
नियमित व्यायाम करना भी मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत ही उपयोगी है। व्यायाम करने से शरीर में रक्त का परिभ्रमण होता है। दिमाग को पूरी मात्रा में रक्त और प्राणवायु प्राप्त होता है। इससे कार्यक्षमता बढ़ती है। शरीर के स्नायु तनाव मुक्त होते हैं। रक्त के परिभ्रमण से रक्त में इकट्ठा हुआ कचरा बाहर निकल जाता है और मन प्रसन्नता का भाव महसूस करता है। हर एक व्यक्ति को रोजाना कम से कम 40 मिनट तक व्यायाम करना चाहिए।

(३) ध्यान-योग : 
आज अधिकांश लोग आधुनिक जीवन शैली के कारण ही तनाव में जी रहे हैं। मानसिक स्वास्थ्य के लिए भारत की पूरे विश्व को दी हुई ध्यान-योग की पद्धति का सभी को उपयोग करना चाहिए। महर्षि पतंजलि ने 'योगसूत्र' में इसकी व्याख्या दी है।

'योग' शब्द संस्कृत 'यूज्' धातु से बना है जिसका अर्थ होता है जुड़ना। जीव का शिव के साथ या आत्मा का परमात्मा के साथ जुड़ना अर्थात योग।

महर्षि पतंजलि ने योग के आठ अंग बताएं हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।

- यम अर्थात् नकारात्मकता से दूर रहना। इसमें सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का समावेश किया जाता है। सत्य अर्थात झूठ न बोलना, अहिंसा अर्थात मन, वचन और कर्म से किसी के दिल को न दुखाना। अस्तेय अर्थात शारीरिक और मानसिक रूप से शुद्ध आचरण करना और अपरिग्रह अर्थात् ज़रूरत से ज्यादा चीजों का संग्रह न करना।

- नियम अर्थात सकारात्मक बनना। इसमें शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान का समावेश किया जाता है। शौच अर्थात् शरीर की आंतरिक और बाह्य शुद्धि। संतोष अर्थात जो मिला है वह काफ़ी है का भाव। तप अर्थात शरीर को कुछ प्रकार के कार्यों को करने के लिए सक्षम बनाना। स्वाध्याय अर्थात 'स्व' का अभ्यास करना। ईश्वरप्रणिधान अर्थात् ख़ुद को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देना।

- आसन अर्थात शरीर और मन को स्थिर करने वाली विशिष्ट प्रकार की शारीरिक स्थिति। आसन करने से स्नायु तनाव मुक्त होते हैं। शरीर स्वस्थ और मन प्रसन्न रहता है। अनुभवी व्यक्ति के मार्गदर्शन तले आसन का अभ्यास करना चाहिए।

- प्राणायाम अर्थात् श्वासोच्छवास की निश्चित प्रक्रिया। प्राणायाम से स्वयं संचालित चेतातंत्र और मन को नियंत्रित किया जा सकता है। प्राणायाम के अनेक प्रकार हैं, जिनका अनुभवी व्यक्ति के मार्गदर्शन तले अभ्यास करना चाहिए।

- प्रत्याहार अर्थात बाह्य और आंतरिक उद्दीपकों की ओर से मन को हटाना।

- धारणा अर्थात मन की स्थिरता। धारणा में व्यक्ति को अपने मन को शांत कर निरंतर लंबे समय तक किसी एक वस्तु या विषय पर ध्यान को केंद्रित करने का प्रयत्न करना होता है। ध्यान की शुरुआत की अवस्था को ही धारणा कहते हैं।

- ध्यान अर्थात किसी एक वस्तु के प्रति चित्त को केंद्रित करना। इस केंद्रीकरण के कारण धीरे-धीरे ध्यान जिस वस्तु पर केंद्रित किया गया है उस वस्तु और ध्यान करनेवाले व्यक्ति के बीच एक होने का भाव पैदा होता है।

- समाधि अर्थात ध्यान करने वाला और ध्यान के उद्दीपक दोनों का एकीकरण। जहाँ सारे क्लेश समाप्त हो जाते हैं और मन एकदम शान्त हो जाता है, उस अवस्था को समाधि कहते हैं। यह ध्यान की सर्वोच्च अवस्था है। इस अवस्था में व्यक्ति को समस्त ब्रह्मांड की एकता, सर्वव्यापकता, परम शांति और परमानंद का अनुभव होता है। भारतीय दर्शन शास्त्र के अनुसार ध्यान की इस चरम सीमा से प्राप्त होने वाला परमानंद विश्व के तमाम प्रकार के आनन्दों में श्रेष्ठतम और उच्चतम आनन्द है और इस आनन्द का अनुभव करना ही मानव जीवन का परम लक्ष्य है।

'श्रीमद्भगवद्गीता' के दूसरे अध्याय में योग की परिभाषा देते हुए कहा गया है- "समत्वम् योग उच्यते।" अर्थात् समता ही योग है। जीवन में राग-द्वेष, प्रेम-घृणा, सुख-दुख और जय-पराजय के चक्कर में पड़कर मनुष्य कभी सुख कभी दुःख का अनुभव करता है। 
लेकिन इन सबके बीच समता को बनाए रखना ही योग है। जीवन में सम-विषम परिस्थितियाँ तो आती ही रहेंगी, लेकिन उन्हें मन पर हावी नहीं होने देना है। इसे स्थितप्रज्ञता की अवस्था कहते हैं। इस अवस्था को प्राप्त करना ही योग का ध्येय है।

(४) जीवन शैली में परिवर्तन :
औद्योगीकरण, शहरीकरण और भौतिक साधनों के कारण लोगों के जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन आया है। वाहन, टीवी, कंप्यूटर, मोबाइल और इंटरनेट के कारण लोगों की खाने-पीने, चलने-फिरने और सोने की आदतें बदल गई हैं। इसका मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।
मनुष्य ने पैसे को अपना परमेश्वर बना दिया है और ख़ुद उसका दास बन गया है। सुबह से लेकर रात तक मनुष्य पैसे के पीछे अंधी दौड़ लगाता रहता है और अपनों को पीछे छोड़ता जाता है। इतना ही नहीं, वह सम्बन्धों के मायने भी भूल गया है। मनुष्य ख़ुद नहीं जानता कि वह कहाँ जा रहा है? किसे पाने के लिए जा रहा है? जब बात समझ में आती है तब बहुत देर हो चुकी होती है। ऐसी भागदौड़ भरी जिंदगी ही मानसिक तनाव का कारण है। मनुष्य को इस प्रकार की जीवन शैली में परिवर्तन लाना ही होगा। सूर्योदय से पहले उठ जाना, प्रकृति का सान्निध्य प्राप्त करना, संगीत सुनना, शुद्ध हवा में टहलने के लिए जाना, आसान और प्राणायाम के लिए थोड़ा वक्त निकालना, दोपहर को समय पर खाना खा लेना, रात को सोने से दो घंटे पहले हल्का भोजन लेना, रात का भोजन करने के बाद थोड़ा चलना, देर रात तक न जागना, इलेक्ट्रॉनिक साधनों का कम उपयोग करना, परिवार के लिए थोड़ा वक्त निकालना, हास्य की कुछ किताबें पढ़ना, छुट्टियों के दौरान गाँवों की ओर रुख करके प्राकृतिक वातावरण में रहना, अपेक्षाएं कम रखना, कम वस्तुओं से जीवन चलाना सीखना, भारतीय संस्कृति के जीवन मूल्यों को अपनाकर चलना और पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण न करना इत्यादि आदतें डालनी होगी।

(५) सकारात्मक दृष्टिकोण : 
मानसिक तनाव से मुक्त होने के लिए व्यक्ति को सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना होगा। एक कहावत भी है- "जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि।" इसका अर्थ यह है कि व्यक्ति जैसा सोचेगा उसे अपने आसपास का जगत वैसा ही दिखेगा। इसलिए जीवन में घटित होने वाली निषेधात्मक घटनाओं का भी सकारात्मक दृष्टिकोण से मूल्यांकन करना चाहिए। इस दृष्टिकोण से व्यक्ति तनाव से मुक्त होगा, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार आएगा, डिप्रेशन से मुक्ति मिलेगी, रक्त का उचित गति से परिभ्रमण होगा, रोगप्रतिकारक क्षमता में वृद्धि होगी और व्यक्ति जीवन में आने वाली विपरीत परिस्थितियों से आसानी से लड़ सकेगा। इसलिए तनाव से भरी हुई परिस्थिति में भी हॅंसने की आदत डालनी चाहिए, क्योंकि हँसी अनेक रोगों की रामबाण औषधि है।

(६) संगीत :
तनाव से मुक्ति दिलाने में एवं मूड को फ्रेश करने में संगीत की अहम भूमिका है। संगीत मन का आहार है। प्रकृति के कण-कण में संगीत है। कोयल की कुहू-कुहू और पपीहे की पीहू-पीहू की आवाज़ कुदरत के संगीत का अद्भुत नज़ारा है। पंछियों का मधुर कलरव, पेड़ के पत्तों की मर्मर ध्वनि, बहती हुई नदी की कलकल ध्वनि, मंद समीर की स र र र र ध्वनि और टिप-टिप बरसता पानी संगीत का ही रूप हैं। प्रकृति के इस संगीत का रसास्वादन करने से दिमाग के तरंगों में परिवर्तन होता है और इससे तनाव से मुक्ति मिलती है। इतना ही नहीं वाद्य यंत्रों का संगीत भी व्यक्ति के ऊपर उतना ही असर करता है। संगीत के कारण व्यक्ति की विचारधारा सकारात्मक बनती है और मानसिक शांति का एहसास होता है। आज़ तो कैंसर, डिप्रेशन और अनिद्रा जैसे रोगों में संगीतोपचार पद्धति बड़ी ही कारगर साबित होती दिखाई देती है।

(७)स्थितप्रज्ञता :
सम-विषम किसी भी परिस्थिति को अपने उपर हावी न होने देना और मन पर नियंत्रण बनाएं रखना अर्थात् स्थितप्रज्ञता। सुख और दुःख का चक्र जीवन में चलता ही रहता है। सुख आने पर इतने खुश न हो जाएं कि उसे पचा न सकें और दुःख आने पर इतने दुःखी न हो जाएं कि जीना ही दुश्वार हो जाए। दोनों परिस्थितियों में 'स्व' पर नियंत्रण रखें और मन को विचलित न होने दें। प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में स्थितप्रज्ञता प्राप्त करनी चाहिए। तनाव कभी भी नज़दीक आने की हिम्मत नहीं करेगा और कोसों दूर भागेगा।

(८) योग निद्रा :
भागदौड़ भरी ज़िंदगी में जिन लोगों के पास समय का अभाव है उन लोगों को तनाव से मुक्ति पाने के लिए रात को सोते समय योग निद्रा का अभ्यास करना चाहिए। आधे से पौने घंटे तक योग निद्रा का अभ्यास करने से मन एकदम शांत हो जाता है, दिन भर की थकान दूर हो जाती है और चैन की नींद आ जाती है।

(९) शिथिलीकरण की प्रयुक्ति :
आधुनिक जीवन शैली के कारण और व्यक्ति के निरंतर तनाव में रहने के कारण शरीर के स्नायु, ग्रंथियों, शारीरिक तंत्र और मनोवैज्ञानिक तंत्र को बड़ा नुकसान पहुंचता है। इस नुकसान से बचने के लिए व्यक्ति को शिथिलीकरण करना सीखना चाहिए। शिथिलीकरण की शुरुआत श्वासोच्छवास पर ध्यान देने से हो सकती है। इसके लिए शवासन की भारतीय पद्धति का उपयोग किया जा सकता है। इसके परिणामस्वरूप शरीर के स्नायु, शारीरिक तंत्र, विचार और मन को शांति मिलती है और ताज़गी का अनुभव होता है। मन में नकारात्मक विचार कम होते हैं और मन परमानन्द का अनुभव करता है।
 



 

 

आइए! हम साथ मिलकर संकल्प करें-
 

व्यस्त जीवन शैली में, एक बदलाव लाएं हम।
भागदौड़ भरी ज़िंदगी में, एक बात ठान लें हम।
स्वदेशी जीवन शैली को, दिल से अपनाएं हम।
रोज़ की दिनचर्या में, थोड़ा-सा वक्त योग के लिए निकालें हम।
आंतरिक-बाह्य उद्दीपकों की ओर से, मन को एकदम हटाएं हम।
अनेकानेक आसनों के अभ्यास से, शरीर को सुगठित बनाएं हम।
प्राणायाम के अभ्यास से, प्रत्येक साँस पर ध्यान रखें हम।
निरंतर योगाभ्यास से, तनाव को हटाएं हम।
विपरीत परिस्थितियों से, हमेशा योद्धा बनकर लड़ें हम। 
चित्त की एकाग्रता से, ध्यान में मग्न हो जाएं हम। 
योग-निद्रा के अभ्यास से, दिन भर की थकान मिटाएं हम।
अष्टांग योग के सूत्र से, परमानंद की प्राप्ति करें हम।
महर्षि पतंजलि के मार्ग पर चलकर, जीवन को सार्थक बनाएं हम।
 

   

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