Bhartiya Parmapara

पहलगाम हमला: जब इंसानियत को धर्म से तोला गया

पहलगाम की गोलियाँ: धर्म पर नहीं, मानवता पर चली थीं 
कश्मीर के पहलगाम में हाल ही में हुआ आतंकी हमला सिर्फ एक गोलीबारी नहीं थी—यह एक ऐसा खौफनाक संदेश था जिसमें गोलियों ने धर्म की पहचान पूछकर चलना शुरू किया। प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो आतंकियों ने पहले पर...

श्रम बिकता है, बोलो... खरीदोगे?

श्रम बिकता है, बोलो ..... खरीदोगे..? (ऐसा बाजार जहां रोज लगता है मेहनतकशों का मेला) 
भारत में जिस गति से जनसंख्या बढ़ रही है उतनी ही गति से बेरोजगारी भी बढ़ी है। हालात ऐसे बदतर हैं कि डिग्रीधारी युवकों को चपरासी तक की नौकरी भी नसीब नहीं हो पा रहीं है तथा भारत...

पर्यावरण संकट बढ़ रहा है—अब बदलाव हमारी ज़िम्...

मैंने अपने पिछले आलेख में बता दिया था कि अगर धरा न होती तो हमारा अस्तित्व ही नहीं होता। अब जब इस पर गहनता से विचारें तो सबसे पहले  यह मानना ही पड़ेगा कि जीवन के लिये आवश्यक ऑक्सीजन, पानी व अन्य सभी सामग्रियां यहां सहजता से उपलब्ध है अर्थात इस धरा पर सभी आधारभूत स...

अहंकार का अंधकार | व्यक्तित्व और समाज पर प्रभ...

अहंकार एक ऐसी मानसिक प्रवृत्ति है, जो व्यक्ति को अपनी श्रेष्ठता का अनुभव कराती है और दूसरों से खुद को ऊँचा दिखाने के लिए उसे हर कदम पर प्रेरित करती है। यह ऐसा भाव है, जो किसी भी व्यक्ति को अपनी कमजोरी को छिपाने और अपनी छवि को बनाए रखने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।...

अन्न का दुरुपयोग – दिखावे की संस्कृति में बर्...

अन्न शरीर की मुख्य आवश्यकता है। इससे शरीर पुष्ट होता है और शरीर को ऊर्जा मिलती है। अन्न की प्रकृति का भी अपना प्रभाव है। कहावत है- 'जैसा खाओ-अन्न वैसा बने मन'। पेट भरने के लिए ही संसार चल रहा है। किसी को जरूरत लायक पूर्ति चाहिए तो कोई संग्रहण में जुटा हुआ है। बावजूद इ...

विज्ञान दिवस और हमारे वैज्ञानिक

भारत में विज्ञान दिवस हर वर्ष 28 फरवरी को मनाया जाता है। मनाया भी क्यों न जाए क्योंकि 28 फरवरी 1928 को भारत के वैज्ञानिक सर सी.वी. रमन ने 'रमन प्रभाव' की महत्वपूर्ण खोज की थी।इसी खोज के लिए 1930 में उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया या यूं कहें भारत को विज्ञा...

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस – नारी शक्ति को सला...

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस: नारी शक्ति का उत्सव 
हर वर्ष 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है, जो महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक योगदान को सम्मान देने का दिन है। यह दिवस न केवल महिलाओं के अधिकारों और समानता की बात करता है, बल्क...

क्या हमारे कार्य करने की कोई सीमा होती है?

क्या हमारे कार्य करने की कोई सीमा होती है? इसका सही-सही उत्तर देना शायद संभव न हो लेकिन हम जितना सोचते हैं उससे कहीं अधिक मुश्किल और असंभव लगने वाला कार्य भी कर सकते हैं।

एक बार एक किसान अपने फ़ार्म हाउस पर काम कर रहा था। तभी उसका ब...

खिचड़ी: ढाई हजार साल पुराना भारतीय व्यंजन, स्...

14 जनवरी मकर संक्रांति के दिवस हुए स्वागत से मैं अभी तक अभिभूत हूँ। "अतिथि देवो भव" की परम्परा का पालन करते हुए प्रत्येक घर में मेरे स्वागत की तैयारियाँ थी। उनका स्वागत देख कर ऐसा लगा जैसे मेरे आने की उन्हें लम्बे समय से प्रतीक्षा थी। सभी ने बड़े प्रेम से मेरा स्वागत...

सरकारी नियंत्रण से मन्दिरों को मुक्त करें – ए...

सनातनी करे पुकार - मन्दिरों को अपने नियन्त्रण से मुक्त करें सरकार

हमारे भामाशाहों ने मन्दिरों को सरकारी नियन्त्रण से बचाने का सब समय प्रयास किया है। जब भी मुगलों ने मन्दिर पर नजर डाली उस समय के भामाशाह आगे आकर उसे बचाने का पूरा-पूर...

प्रदूषण और निजी वाहनों का बढ़ता प्रभाव

वर्तमान समय में हम सभी को ज्ञात है कि प्रदूषण हमारे पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए एक चुनौती बन गया है परंतु जाने अनजाने हम यह भूल जाते हैं कि यह चुनौती हमारे समक्ष है इसलिए हम इससे उबरने की लिए पुरजोर प्रयास नहीं कर रहे हैं। किसी भी चुनौती का सामना हम सफलता पूर्वक तब ह...

सहनशीलता का गिरता स्तर और समाज पर इसके हानिका...

सहनशीलता का गिरता स्तर- समाज के लिए हानिकर

आज भौतिकतावाद, एकाकी परिवार और पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में सहनशीलता शनैः शनैः क्षीण होती जा रही है। है। इस समस्या के मूल में मूल्यों की अवमानना/ स्वार्थपरता की बढ़ती प्रवृत्ति/माता-पित...

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